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Gyan Ganga: रामचरितमानस- जानिये भाग-26 में क्या क्या हुआ Breaking News Update
श्री रामचन्द्राय नम: पुण्यं पापहरं सदा शिवकरं विज्ञानभक्तिप्रदं मायामोहमलापहं सुविमलं प्रेमाम्बुपूरं शुभम्।
श्रीमद्रामचरित्रमानसमिदं भक्त्यावगाहन्ति ये ते संसारपतङ्गघोरकिरणैर्दह्यन्ति नो मानवाः॥ चौपाई कह मुनि बिहसि गूढ़ मृदु बानी।
सुता तुम्हारि सकल गुन खानी॥ सुंदर सहज सुसील सयानी।
नाम उमा अंबिका भवानी॥ भावार्थ:-नारद मुनि ने हँसकर रहस्ययुक्त मधुर वाणी में कहा- तुम्हारी कन्या सब गुणों की खान है।
यह स्वभाव से ही सुंदर, सुशील और समझदार है।
उमा, अम्बिका और भवानी इसके नाम हैं॥ चौपाई सब लच्छन संपन्न कुमारी।
होइहि संतत पियहि पिआरी॥ सदा अचल एहि कर अहिवाता।
एहि तें जसु पैहहिं पितु माता॥ भावार्थ:-कन्या सब सुलक्षणों से सम्पन्न है, यह अपने पति को सदा प्यारी होगी।
इसका सुहाग सदा अचल रहेगा और इससे इसके माता-पिता यश पावेंगे॥ चौपाई होइहि पूज्य सकल जग माहीं।
एहि सेवत कछु दुर्लभ नाहीं॥ एहि कर नामु सुमिरि संसारा।
त्रिय चढ़िहहिं पतिब्रत असिधारा॥ भावार्थ:- यह सारे जगत में पूज्य होगी और इसकी सेवा करने से कुछ भी दुर्लभ न होगा।
संसार में स्त्रियाँ इसका नाम स्मरण करके पतिव्रता रूपी तलवार की धार पर चढ़ जाएँगी॥ इसे भी पढ़ें: Gyan Ganga: रामचरितमानस- जानिये भाग-25 में क्या क्या हुआ चौपाई सैल सुलच्छन सुता तुम्हारी।
सुनहु जे अब अवगुन दुइ चारी॥ अगुन अमान मातु पितु हीना।
उदासीन सब संसय छीना॥ भावार्थ:-हे पर्वतराज! तुम्हारी कन्या सुलच्छनी है।
अब इसमें जो दो-चार अवगुण हैं, उन्हें भी सुन लो।
गुणहीन, मानहीन, माता-पिताविहीन, उदासीन, संशयहीन (लापरवाह) दोहा : जोगी जटिल अकाम मन नगन अमंगल बेष।
अस स्वामी एहि कहँ मिलिहि परी हस्त असि रेख॥ भावार्थ:-योगी, जटाधारी, निष्काम हृदय, नंगा और अमंगल वेष वाला, ऐसा पति इसको मिलेगा।
इसके हाथ में ऐसी ही रेखा पड़ी है॥ चौपाई : सुनि मुनि गिरा सत्य जियँ जानी।
दुख दंपतिहि उमा हरषानी॥ नारदहूँ यह भेदु न जाना।
दसा एक समुझब बिलगाना॥ भावार्थ:-नारद मुनि की वाणी सुनकर और उसको हृदय में सत्य जानकर पति-पत्नी (हिमवान् और मैना) को दुःख हुआ और पार्वतीजी प्रसन्न हुईं।
नारदजी ने भी इस रहस्य को नहीं जाना, क्योंकि सबकी बाहरी दशा एक सी होने पर भी भीतरी समझ भिन्न-भिन्न थी॥ चौपाई सकल सखीं गिरिजा गिरि मैना।
पुलक सरीर भरे जल नैना॥ होइ न मृषा देवरिषि भाषा।
उमा सो बचनु हृदयँ धरि राखा॥ भावार्थ:-सारी सखियाँ, पार्वती, पर्वतराज हिमवान् और मैना सभी के शरीर पुलकित थे और सभी के नेत्रों में जल भरा था।
देवर्षि के वचन असत्य नहीं हो सकते, (यह विचारकर) पार्वती ने उन वचनों को हृदय में धारण कर लिया॥ चौपाई उपजेउ सिव पद कमल सनेहू।
मिलन कठिन मन भा संदेहू॥ जानि कुअवसरु प्रीति दुराई।
सखी उछँग बैठी पुनि जाई॥ भावार्थ:-उन्हें शिवजी के चरण कमलों में स्नेह उत्पन्न हो आया, परन्तु मन में यह संदेह हुआ कि उनका मिलना कठिन है।
अवसर ठीक न जानकर उमा ने अपने प्रेम को छिपा लिया और फिर वे सखी की गोद में जाकर बैठ गईं॥ चौपाई झूठि न होइ देवरिषि बानी।
सोचहिं दंपति सखीं सयानी॥ उर धरि धीर कहइ गिरिराऊ।
कहहु नाथ का करिअ उपाऊ॥ भावार्थ:-देवर्षि की वाणी झूठी न होगी, यह विचार कर हिमवान्, मैना और सारी चतुर सखियाँ चिन्ता करने लगीं।
फिर हृदय में धीरज धरकर पर्वतराज ने कहा- हे नाथ! कहिए, अब क्या उपाय किया जाए?॥ दोहा : कह मुनीस हिमवंत सुनु जो बिधि लिखा लिलार।
देव दनुज नर नाग मुनि कोउ न मेटनिहार॥ भावार्थ:-मुनीश्वर ने कहा- हे हिमवान्! सुनो, विधाता ने ललाट पर जो कुछ लिख दिया है, उसको देवता, दानव, मनुष्य, नाग और मुनि कोई भी नहीं मिटा सकते॥ चौपाई : तदपि एक मैं कहउँ उपाई।
होइ करै जौं दैउ सहाई॥ जस बरु मैं बरनेउँ तुम्ह पाहीं।
मिलिहि उमहि तस संसय नाहीं॥ भावार्थ:-तो भी एक उपाय मैं बताता हूँ।
यदि दैव सहायता करें तो वह सिद्ध हो सकता है।
उमा को वर तो निःसंदेह वैसा ही मिलेगा, जैसा मैंने तुम्हारे सामने वर्णन किया है॥ चौपाई जे जे बर के दोष बखाने।
ते सब सिव पहिं मैं अनुमाने॥ जौं बिबाहु संकर सन होई।
दोषउ गुन सम कह सबु कोई॥ भावार्थ:-परन्तु मैंने वर के जो-जो दोष बतलाए हैं, मेरे अनुमान से वे सभी शिवजी में हैं।
यदि शिवजी के साथ विवाह हो जाए तो दोषों को भी सब लोग गुणों के समान ही कहेंगे॥ चौपाई जौं अहि सेज सयन हरि करहीं।
बुध कछु तिन्ह कर दोषु न धरहीं॥ भानु कृसानु सर्ब रस खाहीं।
तिन्ह कहँ मंद कहत कोउ नाहीं॥ भावार्थ:-जैसे विष्णु भगवान शेषनाग की शय्या पर सोते हैं, तो भी पण्डित लोग उनको कोई दोष नहीं लगाते।
सूर्य और अग्निदेव अच्छे-बुरे सभी रसों का भक्षण करते हैं, परन्तु उनको कोई बुरा नहीं कहता॥ चौपाई सुभ अरु असुभ सलिल सब बहई।
सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई॥ समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं।
रबि पावक सुरसरि की नाईं॥ भावार्थ:-गंगाजी में शुभ और अशुभ सभी जल बहता है, पर कोई उन्हें अपवित्र नहीं कहता।
सूर्य, अग्नि और गंगाजी की भाँति समर्थ को कुछ दोष नहीं लगता॥ दोहा : जौं अस हिसिषा करहिं नर जड़ बिबेक अभिमान।
परहिं कलप भरि नरक महुँ जीव कि ईस समान॥ भावार्थ:-यदि मूर्ख मनुष्य ज्ञान के अभिमान से इस प्रकार होड़ करते हैं, तो वे कल्पभर के लिए नरक में पड़ते हैं।
भला कहीं जीव भी ईश्वर के समान (सर्वथा स्वतंत्र) हो सकता है?॥ चौपाई : सुरसरि जल कृत बारुनि जाना।
कबहुँ न संत करहिं तेहि पाना॥ सुरसरि मिलें सो पावन जैसें।
ईस अनीसहि अंतरु तैसें॥ भावार्थ:-गंगा जल से भी बनाई हुई मदिरा को जानकर संत लोग कभी उसका पान नहीं करते।
पर वही गंगाजी में मिल जाने पर जैसे पवित्र हो जाती है, ईश्वर और जीव में भी वैसा ही भेद है॥ चौपाई संभु सहज समरथ भगवाना।
एहि बिबाहँ सब बिधि कल्याना॥ दुराराध्य पै अहहिं महेसू।
आसुतोष पुनि किएँ कलेसू॥ भावार्थ:-शिवजी सहज ही समर्थ हैं, क्योंकि वे भगवान हैं, इसलिए इस विवाह में सब प्रकार कल्याण है, परन्तु महादेवजी की आराधना बड़ी कठिन है, फिर भी क्लेश (तप) करने से वे बहुत जल्द संतुष्ट हो जाते हैं॥ चौपाई जौं तपु करै कुमारि तुम्हारी।
भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी॥ जद्यपि बर अनेक जग माहीं।
एहि कहँ सिव तजि दूसर नाहीं॥ भावार्थ:-यदि तुम्हारी कन्या तप करे, तो त्रिपुरारि महादेवजी होनहार को मिटा सकते हैं।
यद्यपि संसार में वर अनेक हैं, पर इसके लिए शिवजी को छोड़कर दूसरा वर नहीं है॥ चौपाई बर दायक प्रनतारति भंजन।
कृपासिंधु सेवक मन रंजन॥ इच्छित फल बिनु सिव अवराधें।
लहिअ न कोटि जोग जप साधें॥ भावार्थ:-शिवजी वर देने वाले, शरणागतों के दुःखों का नाश करने वाले, कृपा के समुद्र और सेवकों के मन को प्रसन्न करने वाले हैं।
शिवजी की आराधना किए बिना करोड़ों योग और जप करने पर भी वांछित फल नहीं मिलता॥ दोहा: अस कहि नारद सुमिरि हरि गिरिजहि दीन्हि असीस।
होइहि यह कल्यान अब संसय तजहु गिरीस॥ भावार्थ:-ऐसा कहकर भगवान का स्मरण करके नारदजी ने पार्वती को आशीर्वाद दिया।
(और कहा कि-) हे पर्वतराज! तुम संदेह का त्याग कर दो, अब यह कल्याण ही होगा॥ शेष अगले प्रसंग में ------------- राम रामेति रामेति, रमे रामे मनोरमे।
सहस्रनाम तत्तुल्यं, रामनाम वरानने ॥ - आरएन तिवारी।
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Posted on 23 July 2025 | Keep reading HeadlinesNow.com for news updates.
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