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पवन के. वर्मा का कॉलम:बिहार में और भी कई जरूरी मसले और समस्याएं मौजूद हैं Breaking News Update
बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले वहां ‘अवैध घुसपैठियों और प्रवासियों’ का मुद्दा चर्चाओं में है।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह राष्ट्रीय चिंता की अभिव्यक्ति है या चुनावी माहौल में ध्रुवीकरण या ध्यान भटकाने का प्रयास? एक हद तक यह वास्तविक मुद्दा है।
क्योंकि कोई भी देश अवैध प्रवासियों की घुसपैठ को अनुमति नहीं दे सकता।
लेकिन बिहार के गया में हाल ही में एक भाषण के दौरान प्रधानमंत्री द्वारा इस चिंता को जताने का समय और इसके कारण उत्सुकता जगाते हैं।
यदि घुसपैठिये सही में चिंता का कारण हैं तो यह पूछना लाजिमी है कि बीते 11 सालों से केंद्र सरकार क्या कर रही थी? खासकर तब, जब बिहार में बीते 8 वर्षों से डबल इंजन वाली एनडीए सरकार है।
इस मसले पर कोई नीतिगत प्रस्ताव, सांख्यिकी आकलन और सतत प्रशासनिक कार्रवाइयां क्या कहीं नजर आई हैं? सीमा की सुरक्षा, निगरानी और अवैध प्रवास रोकने का जिम्मा केंद्र का है।
ऐसे में यह तय है कि प्रधानमंत्री सार्वजनिक तौर पर अपनी विफलता की स्वीकारोक्ति तो नहीं ही कर रहे थे।
सरकार के अधिकांश कार्यकाल के दौरान बिहार के राजनीतिक विमर्श में यह मुद्दा दबा ही रहा।
संसदीय बहस या नीतिगत पहलों में शायद ही इसका जिक्र हुआ।
अब चुनाव नजदीक आते ही भाषणों और सुर्खियों में यह मुद्दा छा गया है।
यह सवाल भी उठता है कि इस चिंता के साक्ष्य कहां हैं? निर्वाचन आयोग ने एक सामान्य-सा बयान दिया है कि ‘बिहार में बड़ी संख्या में नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार के लोग हैं।
’ लेकिन एसआईआर के नाम पर जिन 65 लाख मतदाताओं के नाम आयोग हटा चुका, उनमें अधिकतर- जैसा कि वह खुद दावा करता है- या तो मृत हैं या कहीं और रहने चले गए हैं।
उनके नाम कई निर्वाचन क्षेत्रों में हैं या उनका अता-पता नही है।
कितने मतदाताओं को आयोग या किसी अन्य सरकारी अधिकारी ने रोहिंग्या या बांग्लादेशी के तौर पर चिह्नित किया, इसके आंकड़े सार्वजनिक किए जाने चाहिए।
बिहार असम की तरह बांग्लादेश से एक लंबी और घुसपैठ के लिए जोखिमभरी सीमा नहीं साझा करता है।
बिहार ऐतिहासिक रूप से बड़े पैमाने पर अवैध प्रवास का केंद्र भी नहीं रहा है।
इसकी समस्याएं अंदरूनी हैं : गरीबी, पलायन, खराब बुनियादी ढांचा, व्यापक बेरोजगारी, कृषि संकट और जनस्वास्थ्य व शिक्षा का चरमराया हुआ ढांचा।
यह अबूझ पहेली है कि जब इतने बड़े मुद्दे मुंह बाए खड़े हैं, तो अचानक अवैध प्रवासियों के मसले को इतनी प्राथमिकता क्यों दी जा रही है? ध्यान भटकाने के राजनीतिक कौशल में इसका जवाब छिपा हो सकता है।
जब सरकारें खुद को राजकाज में पिछड़ते देखती हैं तो वे मतदाताओं का ध्यान दूसरे मुद्दों की ओर भटकाने की कोशिशें करती हैं।
इस खतरे को दिखाकर अकसर चुनाव को सरकार के प्रदर्शन पर होने वाले जनमत-संग्रह से भटकाकर देश बचाने की नैतिक मुहिम में बदलने का प्रयास किया जाता है।
यह एक जांचा-परखा फॉर्मूला है, जो भारत के लिए अनोखा नहीं।
नीतिगत चिंताओं से परे ऐसे भाषणों की भाषा अकसर पहचान की सियासत के दायरे में चली जाती है।
अवैध घुसपैठियों को अकसर परोक्ष रूप से किसी समुदाय विशेष से जोड़ दिया जाता है।
जानबूझकर किए गए इस घालमेल से डर, आक्रोश और अंततः साम्प्रदायिक विभाजन पनपता है।
यह पड़ोसी को पड़ोसी के खिलाफ कर देता है और जहां विचारधाराओं की प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए थी, वहां सामुदायिक पहचान का मुकाबला हावी हो जाता है।
लंबे समय से धर्म-जाति के नाम पर बिहार की जनता के हितों की बलि दी जाती रही है।
ऐसी राजनीति महज चुनावी खेल नहीं, बल्कि यह भारत के सामाजिक ताने-बाने में जहर घोलना है।
सदियों से बिहार सांस्कृतिक मेलजोल की भूमि रहा है, जहां हिंदू और मुस्लिम, ऊंची और नीची जातियां न केवल अपनी जमीन बल्कि विरासत भी साझा करते रहे हैं।
बौद्ध धर्म का केंद्र और महात्मा गांधी के चम्पारण सत्याग्रह की भूमि रहा यह राज्य कभी विविधता में सामंजस्य का प्रतीक रहा था।
इस परिवेश में विभाजनकारी नैरेटिव घुसाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
इसमें भी बड़ा खतरा तो स्वयं भारतीय लोकतंत्र को है।
चुनाव जनता के लिए शासन का मूल्यांकन करने, प्रतिस्पर्धी नजरियों पर बहस करने और नेताओं को जवाबदेह ठहराने का अवसर होना चाहिए।
जब यह ‘हम’ और ‘वो’ के दृष्टिकोण में बदल जाता है, तो लोकतंत्र भीतर से खोखला हो जाता है।
असम के उलट बिहार बांग्लादेश से एक लंबी और घुसपैठ के लिए जोखिमभरी सीमा नहीं साझा करता है।
बिहार ऐतिहासिक रूप से बड़े पैमाने पर अवैध प्रवास का केंद्र भी नहीं रहा है।
इसकी वास्तविक समस्याएं तो अंदरूनी हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)।
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Posted on 30 August 2025 | Keep reading HeadlinesNow.com for news updates.
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