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डेरेक ओ ब्रायन का कॉलम:मानसून सत्र में संसदीय परम्पराओं को ठेस पहुंची Breaking News Update
पूरे मानसून सत्र में एक माह तक संसद लगभग ठप रही।
लोकसभा और राज्यसभा- दोनों में गतिरोध किसने पैदा किया? क्या कारण था कि विपक्षी सांसदों के पास नारे लगाने और बार-बार वेल में उतरने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा? सत्ता पक्ष के प्रमुख नेताओं ने विपक्ष के प्रमुख प्रतिनिधियों से अनौपचारिक वार्ता में रुचि क्यों नहीं दिखाई? सरकार अपने किए कामों को सही नहीं ठहरा पाती।
उलटे संसदीय परंपराओं को हानि पहुंचाती है।
यह कैसे किया गया, कुछ तथ्य पेश हैं।
1. एसआईआर समेत किसी भी अहम मुद्दे पर चर्चा के लिए विपक्ष द्वारा दिए नोटिसों को खारिज किया।
2. सार्थक चर्चा से बचने के लिए दो बहाने गिनाए।
पहला, मामला अदालत में विचाराधीन है।
दूसरा, संसद में निर्वाचन आयोग पर चर्चा नहीं की जा सकती।
3. विपक्ष ने जब संसद की कार्यवाही सुचारु करने के प्रयास किए तो भी अड़ंगा डाला।
विपक्ष निर्वाचन प्रक्रिया को मजबूत करने की तत्काल आवश्यकता विषय पर चर्चा के लिए तैयार था।
इसमें एसआईआर और निर्वाचन आयोग का तो कोई जिक्र ही नहीं था।
फिर भी केंद्र ने चर्चा कराने से इनकार कर दिया।
4. लोकसभा में छह विधेयक (आईआईएम, मणिपुर जीएसटी, ऑनलाइन गेमिंग, मणिपुर विनियोग, आयकर और कराधान कानून) बिना चर्चा के पारित कर दिए गए।
आखिरी दिन जब राज्यसभा में ऑनलाइन गेमिंग विधेयक पर चर्चा हो रही थी तो संसदीय कार्य मंत्री ने एक सदस्य को बीच में टोककर कहा व्यवधान के बीच कोई भी बोल या सुन नहीं पा रहा है।
इसलिए हम अनुरोध करते हैं कि विधेयक पारित कर दिया जाए।
5. संसद में हर कार्य के लिए कार्य सलाहकार समिति (बीएसी) समय आवंटित करती है।
मैं इसका सदस्य हूं।
इस मानसून सत्र के शुरुआती दो दिनों में बीएसी की बैठक को पांच बार री-शेड्यूल्ड किया गया।
तत्कालीन सभापति जगदीप धनखड़ की अध्यक्षता में पहली बैठक 21 जुलाई को दोपहर 12:30 बजे हुई।
इसमें राज्यसभा में सदन के नेता जेपी नड्डा और संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू मौजूद थे।
हालांकि आगामी किसी भी बैठक में दोनों सरकारी प्रतिनिधियों ने हिस्सा नहीं लिया।
21 जुलाई की रात को ही उपराष्ट्रपति ने अपना इस्तीफा दे दिया।
यह समझ से परे था।
6. संसदीय नियमों के अनुसार सभापति के निर्णय पर कोई भी सदस्य, किसी भी वक्त ‘व्यवस्था का प्रश्न’ उठा सकता है।
मानसून सत्र में विपक्षी सदस्यों ने कई बार व्यवस्था का प्रश्न उठाया।
कम से कम 17 बार इसे मंजूरी नहीं दी गई।
7. सत्र के अंत में गृह मंत्री अमित शाह ने तीन महत्वपूर्ण विधेयक पेश किए।
उन्होंने लोकसभा और राज्यसभा में इन विधेयकों की जांच के लिए जेपीसी गठित करने के लिए प्रस्ताव भी पेश किए।
जेपीसी का ट्रैक रिकॉर्ड क्या है? क्या वे प्रभावी और पारदर्शी रही हैं? आप खुद ही तय करें।
अब जेपीसी के बारे में कुछ तथ्य सुनें : 1. दल अपनी संख्या के आधार पर जेपीसी के सदस्यों को नामित करते हैं।
अधिक संख्या के कारण इनमें सत्ताधारी दल या गठबंधन का ही दबदबा रहता है।
जेपीसी की सिफारिशें महज सलाह होती हैं, जिन्हें मानने के लिए सरकार बाध्य नहीं है।
2. 1987 में बोफोर्स घोटाले की जांच के लिए जेपीसी बनी थी।
छह विपक्षी दलों ने इसका बहिष्कार किया, क्योंकि ज्यादातर सदस्य कांग्रेस के थे।
इनमें से टीडीपी और असम गण परिषद आज भी भाजपा के सहयोगी हैं।
1988 में पेश हुई इसकी रिपोर्ट को विपक्ष ने पक्षपातपूर्ण बताते हुए खारिज कर दिया था।
3. प्रतिभूतियों और बैंकिंग लेनदेन में अनियमितताओं पर 1993 में पेश जेपीसी की रिपोर्ट में 273 सिफारिशें की गई थीं।
वास्तविकता में इनमें से केवल 87 लागू की गईं।
2013 में पेश ‘टेलीकॉम लाइसेंस एवं स्पेक्ट्रम के आवंटन और मूल्य निर्धारण’ संबंधी जेपीसी की रिपोर्ट में 74 सिफारिशें थीं।
हमें नहीं पता इनमें से कितनी लागू हुईं, क्योंकि ‘एक्शन टेकन रिपोर्ट’ पेश ही नहीं की गई।
4. 2013 में अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलीकॉप्टर खरीद की जांच के लिए जेपीसी गठित करने का प्रस्ताव राज्यसभा में पारित हुआ था।
इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए तत्कालीन विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने कहा यह अर्थहीन है और ध्यान भटकाने के लिए सरकार की रणनीति है।
5. 2014 से 2024 के बीच संसद में 11 जेपीसी गठित हुईं।
सात मामलों में एक जेपीसी गठित करने का प्रस्ताव सत्र के अंतिम दिन मंजूर किया गया।
जबकि 2004 से 2014 के बीच 3 ही जेपीसी गठित हुई थीं और इनमें से किसी का गठन आखिरी दिन नहीं हुआ।
विपक्ष निर्वाचन प्रक्रिया को मजबूत करने की तत्काल आवश्यकता विषय पर चर्चा करने के लिए तैयार था।
इसमें एसआईआर और निर्वाचन आयोग का तो कोई जिक्र ही नहीं था।
फिर भी केंद्र सरकार ने इस पर चर्चा से इनकार कर दिया।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)।
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Posted on 30 August 2025 | Visit HeadlinesNow.com for more stories.
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