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नेताओं को सुधारने के लिए बन रहे हैं इंडोनेशिया जैसे हालात Breaking News Update

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नेताओं को सुधारने के लिए बन रहे हैं इंडोनेशिया जैसे हालात Breaking News Update

इंडोनेशिया की राजधानी में संसद पहुंचने की कोशिश कर रहे हजारों पत्थरबाज छात्रों पर दंगा पुलिस ने आंसू गैस के कई राउंड दागे।

ये छात्र संसद सदस्यों के भव्य भत्तों का विरोध करने के लिए वहां पहुंचे थे।

प्रदर्शनकारी हाल की रिपोर्टों से नाराज थे कि प्रतिनिधि सभा के 580 सदस्यों को सितंबर 2024 से प्रति माह 50 मिलियन रुपिया (एसडी 3,075) का आवास भत्ता मिल रहा है।

सांसदों को प्रति महीने दिया जाने वाला भत्ता एक इंडोनेशियाई नागरिक के प्रति महीने आय से 20 गुना ज्यादा है।

इंडोनेशिया की संसद के 580 सदस्यों को सितंबर 2024 से 5 करोड़ रुपये (3,075 डॉलर) आवास भत्ता के तौर पर दिए जा रहे हैं।

   इंडोनेशिया में भ्रष्टाचार व्याप्त है और कार्यकर्ताओं का कहना है कि 28 करोड़ से ज़्यादा की आबादी वाले देश में पुलिस और संसद सदस्यों को व्यापक रूप से भ्रष्ट माना जाता है।

नेताओं के रवैये को देखकर लगता है कि भारत में भी देर-सबेर ऐसे हालात बन रहे हैं।

मंत्री, सांसद-विधायकों का सही मायने में देश के लोगों की हालत से ज्यादा सरोकार नहीं रह गया है।

संसद के मॉनसून सत्र में लोकसभा में चर्चा के लिए 120 घंटे तय थे किन्तु 37 घंटे ही चर्चा हो पाई।

हंगामें के कारण कार्रवाई ठप होने से जनता कई सौ करोड़ के धन का नुकसान हुआ।

लगातार व्यवधानों के कारण केवल एक तिहाई समय तक ही सक्रिय रूप से चल पाया।

इसमें बड़ा हिस्सा ऑपरेशन सिंदूर पर चर्चा का रहा।

अधिकांश समय हंगामे में बीता, जिससे विधेयक बिना पर्याप्त चर्चा के पारित किए गए।

राज्य सभा में 285 सवाल पूछने के बावजूद केवल 14 सवालों का ही जवाब सत्र के दौरान दिया गया।

लगातार 20 दिनों तक इंडिया ब्लॉक से जुड़े विपक्षी दलों ने बिहार में मतदाता सूची के पुनर्निरीक्षण केमुद्दे पर लोक सभा और राज्य सभा के अंदर और बाहर जमकर हंगामा और प्रदर्शन किया।

इसकी वजह से दोनों सदनों की कार्यवाही काफी बाधित हुई।

राज्य सभा के डिप्टी चेयरमैन हरवंश ने मॉनसून सत्र के आखिरी दिन अपने समापन भाषण में कहा कि कुल मिलाकर, सदन केवल 41 घंटे 15 मिनट ही चल पाया।

इस सत्र की उत्पादकता निराशाजनक रूप से सिर्फ 38.88 प्रतिशत रही, जो गंभीर आत्मचिंतन का विषय है।

इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि चुने हुए जनप्रतिनिधी देशहित के लिए कितने गंभीर हैं।

    काम नहीं तो वेतन नहीं, संसद में इस मुद्दे पर कोई आवाज नहीं उठाता।

किसी भी कारण से संसद का कामकाज हो या नहीं, इससे सांसदों को फर्क नहीं पड़ता।

उन्हें पूरा वेतन-भत्ता मिलता है।

काम नहीं करने के आधार पर इसमें कटौती की कोई चर्चा तक नहीं करता।

दमन और दीव के केंद्र शासित प्रदेश के निर्दलीय सांसद उमेश पटेल अकेले ऐसे सांसद रहे जिन्होंने यह मांग उठाई।

उन्होंने कहा था कि अगर सदन नहीं चलता है, तो सांसदों को भत्ता भी नहीं मिलना चाहिए।

उनका दावा था कि सांसदों को भत्ता तो मिलता है, लेकिन जनता के काम नहीं हो पाते।

उन्होंने आरोप लगाया था कि सत्ता और विपक्ष दोनों की इगो के कारण सदन नहीं चलने दिया जा रहा है, जबकि विपक्षी दल सरकार को ही इसके लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।

उन्होंने कहा कि सदन में कार्य नहीं होने पर सांसदों का वेतन और अन्य लाभ रोके जाने चाहिए।

संसद की कार्रवाई ठप करने के लिए सत्तापक्ष और विपक्ष एक-दूसरे पर आरोपों का ठीकरा फोड़ते हैं, लेकिन जब बात वेतन-भत्ते बढ़ाने की आती है तो सब मिल कर एक हो जाते हैं।

इस पर कोई बहस तक नहीं होती।

वेतन-भत्तों के एवज में सांसदों की उत्पादकता कितनी रही, इसका विश्लेषण तक नहीं किया जाता।

देश जब 79वां स्वतंत्रता दिवस मनाता है, तब उस दौरान मॉनसून सत्र में 79 घंटे भी संसद नहीं चली।

देश की संसद के मॉनसून सत्र में लोकसभा में 83 घंटे काम नहीं हुआ।

इससे 124 करोड़़ 50 लाख रुपए जनता का धन बर्बाद हुआ।

राज्यसभा में 73 घंटे ठप रही, इससे 80 करोड़़ रुपए व्यर्थ गए।

मतलब दोनों सदनों में मिलाकर 204 करोड़ 50 लाख रुपए बर्बाद कर दिए गए।

संसद में जहां घंटाभर बैठकर सांसद काम नहीं कर सकते हैं, उन्हें ही 5-5 साल की जिम्मेदारी देकर जनता भेज देती है।

संसद में बैठने वाले 93 प्रतिशत सांसद करोड़पति हैं, जिन्हें अभी एक लाख 24 हजार रुपए हर महीने वेतन मिलता है।

संसदीय क्षेत्र भत्ता 84 हजार रुपए होता है।

दैनिक भत्ता सांसदों का 2500 रुपए है।

वेतन भत्ता जोड़कर हर सांसद को हर महीने दो लाख 54 हजार रुपए जनता के पैसे से दिया जाता है।

देशहित के नाम पर हंगामा कर संसद की कार्रवाई ठप करने में सांसद कोई मौका नहीं छोड़ते पर जब बात वेतन-भत्ते बढ़ाने की आती है तो सब एक हो जाते हैं।

गत वर्ष संसद सदस्यों के वेतन में 24 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई।

नया वेतन 1 अप्रैल 2023 से प्रभावी माना गया।

इसके साथ ही सांसदों का मासिक वेतन कुछ भत्तों और सुविधाओं के अलावा 1.24 लाख रुपये हो गया है।

सरकार का कहना था कि बढ़ती महंगाई को देखते हुए सांसदों के वेतन में वृद्धि की गई।

वहीं पूर्व सदस्यों के लिए पांच साल से अधिक की सेवा पर प्रत्येक वर्ष के लिए अतिरिक्त पेंशन की घोषणा की गयी।

इसमें कहा गया है कि दैनिक भत्ता 2,000 रुपये से बढ़ाकर 2,500 रुपये कर दिया गया है।

    इसे भी पढ़ें: अमेरिका में रह रहे भारतीय चुप क्यों हैं? क्या देशभक्ति सिर्फ नारों तक सीमित है? पूर्व सांसदों की पेंशन 25,000 रुपये प्रति माह से बढ़ाकर 31,000 रुपये प्रति माह कर दी गई।

पांच साल से अधिक की सेवा पर प्रत्येक वर्ष के लिए अतिरिक्त पेंशन 2,000 रुपये प्रति माह से बढ़ाकर 2,500 रुपये प्रति माह कर दी गई।

1954 के सांसद वेतन, भत्ता और पेंशन अधिनियम के तहत उन्हें यह सुविधा दी गई है।

हर पांच साल में होता है रिव्यू 2018 के बाद से सांसदों के वेतन और भत्ते की हर पांच साल पर समीक्षा होती है।

यह समीक्षा महंगाई दर पर आधारित होती है।

2018 में सांसदों के वेतन और भत्तों के लिए कानून में संशोधन किया गया था।

सांसदों को विट्ठलभाई पटेल (वीपी) हाउस में हॉस्टल से लेकर मध्य दिल्ली में दो बेडरूम वाले फ्लैट और बंगले तक आवास मिलता है।

उन्हें बिजली, पानी, टेलीफोन और इंटरनेट शुल्क के लिए भी राशि दी जाती है।

संसद में निरंतर हंगामे के परिणामस्वरूप दोनों सदनों में लंबे समय तक स्थगन होता है जो अंतत: सदन में सार्वजनिक नीति के निर्माण को प्रभावित करता है।

भारत दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में से एक है, जहां नीति पर अपनी राय के साथ हर किसी की अपनी आवाज है, लेकिन ये लंबे समय तक व्यवधान संसद की क्षमता को कम कर रहा है।

दिन के अंत में हमें क्या परिणाम मिलता है, और चर्चा से हमें कितना लाभ होता है? संसद अपने नियम और विनियम बनाती है, विधायी निकायों के प्रभावी कामकाज के लिए उन नियमों और विनियमों का पालन करना सदस्यों पर निर्भर है।

ऐसा कब तक होगा? संसद को व्यक्तिगत स्तर और पार्टी स्तर दोनों पर आंतरिक जांच और संतुलन के साथ आना होगा।

बार-बार व्यवधान डालने पर आनुपातिक दंड लगाया जा सकता है।

एक संसद व्यवधान सूचकांक तैयार किया जा सकता है जिस पर व्यवधानों का स्वत: निलंबन लागू किया जा सकता है।

साथ ही संसद के कार्य दिवसों में वृद्धि की जानी चाहिए।

लगातार व्यवधान एक नया मानदंड बनता जा रहा है जो पार्टियों के बीच विश्वास की कमी को बढ़ाता है।

यह प्रवृत्ति एक स्वस्थ लोकतंत्र और संसदीय प्रणाली की निष्पक्षता में सेंध के लिए खराब है।

- योगेन्द्र योगी।

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Posted on 08 September 2025 | Keep reading HeadlinesNow.com for news updates.

Topics:
राजनीति Politics News

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