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राष्ट्रपति, राज्यपालों पर SC का फैसला: क्या बदलेगा भारत का संवैधानिक ढांचा? Supreme Court Rules Bill Signature Deadline
हेडलाइंसनाउ की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति और राज्यपालों द्वारा विधेयकों पर हस्ताक्षर करने की समयसीमा को लेकर महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वह केवल संविधान की व्याख्या करेगा, न कि किसी व्यक्तिगत राज्य या व्यक्ति के मामले में।
यह निर्णय राज्य सरकारों द्वारा भेजे गए विधेयकों पर राज्यपालों और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर करने में लगने वाले समय को लेकर लंबित विवाद के संदर्भ में आया है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि यदि अलग-अलग राज्यों के उदाहरण दिए जाते हैं, तो केंद्र सरकार को भी जवाब दाखिल करना होगा।
इस पर चीफ़ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच जजों की पीठ ने कहा कि वे अलग-अलग राज्यों के मामलों में नहीं उलझेंगे, बल्कि केवल संवैधानिक धाराओं पर ध्यान केंद्रित करेंगे।
वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने तर्क दिया कि यदि विधानसभा किसी विधेयक को वापस नहीं भेजना चाहती है, तो वह अपने आप अस्वीकृत माना जा सकता है।
उन्होंने यह भी बताया कि यदि राज्यपाल विधेयक को विधानसभा को वापस नहीं भेजते हैं, तो अनुच्छेद 200 की प्रक्रिया बाधित हो जाती है।
गौरतलब है कि मई में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट से पूछा था कि क्या अदालत राज्यपालों और राष्ट्रपति को बिलों पर फैसला करने के लिए समय-सीमा निर्धारित कर सकती है।
यह निर्णय भारत के संवैधानिक ढांचे और सरकार की कार्यप्रणाली पर गहरा प्रभाव डाल सकता है, और राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा को जन्म दे सकता है।
इस मामले की अगली सुनवाई का इंतज़ार है।
- SC ने राष्ट्रपति के मामले में संविधान की व्याख्या करने का निर्णय लिया।
- राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए बिलों पर फैसले की समयसीमा पर बहस।
- संविधान की धाराओं पर केंद्रित रहेगा सुप्रीम कोर्ट का ध्यान।
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Posted on 02 September 2025 | Follow HeadlinesNow.com for the latest updates.
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